बुधवार, 9 अगस्त 2017

||बेचारी इंग्लैंड की नारी||

मैं ठहरी बेचारी,
इंग्लैंड की नारी.
एक छत्तीसगढ़िया पे,
अपना दिल हारी.

सात समुंदर,
बहुत पीछे छोड़ के.
आ गई उसकी खातिर मैं,
सारी रस्में तोड़के.

कितने काम घर लिपाई-धान रोपाई,
पड़ गया मेरे हाथ में छाला.
बहा रही हूँ रोज पसीना,
तन हो रहा है मेरा काला.

इंटेलिजेंट को छोड़के,
टेटकू को बनाया दूल्हा.
रोती हूँ मैं दिन-रात,
फूँकती हूं अब चूल्हा.

काश कि पढ़ाई छोड़ कर मैंने,
फेसबुक-वाट्सएप न चलाया होता.
तो शायद मेरी जिंदगी में,
ऐसा खतरनाक मोड़ न आया होता.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
ग्राम केरावाही(पुजारी पारा)
कोंडागांव छत्तीसगढ़

||सच्चा ज्ञान||

रमेश आश्चर्यचकित रह गया.उसने सपने में भी सोचा ही नहीं था कि इस बियाबान में रहने वाले किसी आदिवासी का बच्चा उनसे ऐसा सवाल भी कर सकता है.
एक 9 साल के बच्चे ने उनके ज्ञान और अनुभव को चुनौती दे डाली.उसे बहुत आत्मग्लानि हुई.

रात को वह करवटें बदलता रहा.आखिर क्या था उस श्यामपट्ट में खिंचे लकीर का रहस्य? किसी वनवासी बालक में ऐसे विचार एकाएक कहाँ से आए?

रमेश एक शिक्षक है.पर एक शिक्षक के गुण में कितने हैं,वो भली भांति जानता है.लगभग जंगलों से घिरा हुआ एक छोटा सा प्राथमिक स्कूल और वहां पढ़ने वाले 15 बच्चे.आदिवासियों का इलाका,जो बस अपने में ही मस्त रहते थे.वे तो केवल ये सोच कर ही खुश हो जाते थे कि उनके बच्चे स्कूल में जाकर पढ़ रहे हैं.
पालकों की शिक्षा के प्रति इसी उदासीनता ने रमेश को भी लापरवाह बना दिया.
कभी-कभी वो शराब पी लेता था.

आज भी वैसा ही हुआ.आज जब वह मदमस्त होकर स्कूल गया,उसे बच्चों को पढ़ाने का मन ही नहीं किया. इसलिए वह बच्चों को आपस में उलझाने के लिए एक प्रश्न कर बैठा.

"बताओ कि जीवन क्या है?"

उसने सभी बच्चों से ये प्रश्न किया. पर कोई भी उसका जवाब नहीं दे पाया. रमेश को पता था कि कोई भी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाएगा.अपने ही में मस्त रहने वाले आदिवासियों के बच्चे भला जीवन का महत्व क्या जानें.
अंत में  मंगू की बारी आई.वह होशियार लड़का तो था,पर उससे भी गुरु जी को किसी उत्तर की आशा नहीं थी.

मंगू उठा और सीधे शिक्षक की ओर बढ़ गया.शिक्षक के हाथ से चॉक लेकर उसने श्यामपट्ट पर एक लंबी लकीर खींची और तुरंत ही उसे मिटा दिया.

"ये क्या है?"

"मैंने आपके प्रश्न का उत्तर दे दिया."

"पर मैं तो समझा नहीं."

"हां मैं जानता हूँ आपने उत्तर समझा नहीं.मेरे अनकहे उत्तर को समझने के लिए मैं आपको कल तक का समय देता हूं.समझ न आए तो मैं तो हूं न."

आज रमेश श्यामपट्ट में खींचकर मिटाए गए उसी लकीर को लेकर परेशान था.

उसी सोच में कब सुबह हुई,पता ही नहीं चला.

उत्तर की तलाश में आज वह समय से आधे घंटे पहले शाला में पहुंच गया.प्रार्थना-राष्ट्रगान हुआ.सभी अपनी कक्षा में बैठ गए.
रमेश ने चौथी कक्षा में प्रवेश किया.

"जीवन क्या है?इस प्रश्न का तुमने जो उत्तर दिया न,मैं तो उसे  समझ ही नहीं पाया."

सब बच्चे खिल खिलाकर हंस पड़े.ऐसा पहली बार हुआ था कि खुद शिक्षक ही आज निरुत्तर हो गया.

अब मांगू की बारी थी. न केवल शिक्षक बल्कि सारे बच्चों की नजर बस मंगू पर ही केंद्रित थी.

"सर आपने पूछा था कि जीवन क्या है?मैंने श्यामपट पर एक लकीर खींच कर ये बताया ,कि जीवन श्यामपट्ट पर खींची गई एक लकीर के समान है,जो कभी भी मिट सकती है.इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने जीवन को उत्तम बनाने का प्रयत्न करें.हम नशे का त्याग करें और अपने कर्तव्यों का पूरी इमानदारी से पालन करें."

मंगू के मुख से ऐसी दार्शनिक बातें सुनकर रमेश बहुत ही प्रसन्न हुआ.
जैसे उसे जीवन का सच्चा ज्ञान मिल गया.
उसने उसी दिन से ही शराब का त्याग कर दिया और अपने सारे कार्य पूरी ईमानदारी से करने लगा.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
ग्राम केरावाही(पुजारी पारा)
कोंडागांव छत्तीसगढ़

सोमवार, 7 अगस्त 2017

||जमीं को जन्नत बनाना है||

हाँ तुझसे बनी है मेरी ये मिट्टी,
और इसके मिट्टी होने से पहलेे,
ऐ मिट्टी,मुझे तेरा कर्ज चुकाना है.

होते हैं जिनके बड़े नसीब,
नसीब होती है उसी को हिन्द की जमीं.
मिटा दुश्वारियों को सब के,
जमीं को जन्नत बनाना है.

आरजू है परवाज़ की पर,
पर नहीं है गर,तू कोई ग़म न कर.
लिए हौसलों के पंख तुझे,
बस उड़ते ही जाना है.

समय का नहीं है ठिकाना,
ठिकाना न बना प्यारे तू इस ठौर को.
मौत है माशूका तेरी,
इक रोज गले से लगाना है.

हैं झूठे ये मजहब-जाति-पंथ के भेद,
भेद समझे ये,हजारों में कोई एक,
जकड़े रहे फिरंगी जंजीरों में बरसों,
क्या देश को फिर से गुलाम बनाना है?

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
केरावाही(कोण्डागाँव छ.ग.)

||बहन को मिला भाई ||

भाई नहीं था कोई,
यमुना आज उदास थी.
राखी रखी उसने,
अपने पास थी.

बोली माँ-"मिल जाता है सबकुछ,
यदि कोई ईश्वर को मना ले.
द्वारे खड़े हो कर देख,
दिखे कोई उसे अपना भाई बना ले."

यमुना खड़ी होकर उत्सुक,
घर के आंगन में.
भाई मिलने की खुशियां,
हिलोरें लेती थीं मन में.

रंग बिरंगे कपड़े पहने,
बहनें भाइयों के घर जा रही थीं.
आज था दिन खुशियों का,
सभी मुस्कुरा रही थीं.

उसका एक एक पल,
जैसे युग सा गुजरा.
पर कोई भी लड़का,
उस रास्ते से न गुजरा.

शायद न होगी,
पूरी उसकी आस.
लौटी वापस घर को अपने,
होकर वह निराश.

शायद दुख देख बहन का,
विधाता का दिल भी पिघला.
अचानक उधर से,
एक घुड़सवार निकला.

रूका बोला-"जरा
सुनो तो मेरा कहना.
मैं हूं बहुत प्यासा,
क्या जल मिलेगा मुझे बहना.

यमुना की आंखें,
खुशी से भर आईं.
क्योंकि बड़ी देर के बाद
उसकी आस पूरी होने को आई.

यमुना ने झट उसे,
अपनी बात बताई.
बहुत खुश हुआ वह,क्योंकि,
वह भी था बहन रहित भाई.

बहन ने भाई को,
पीढ़े पर बिठाया.
आरती की थाल सजाई,
दीपक जलाया.

भाई के माथे पर,
लगाया रक्त चंदन.
हाथ जोड़ दोनों,
किया ईश्वर का वंदन.

सारी धरती चाहे,
इधर की उधर हो जाए.
पर मेरे भाई पर कभी,
कोई आंच न आए.

रहती थी जो कल तक सूनी,
आज सजी राखी से वो कलाई.
भाई को एक बहन मिला,
एक बहन को मिल गया भाई.

भैया ने दिया बहन को,
एक सुंदर सा उपहार.
स्वर्ग में भी शायद होगा दुर्लभ,
ऐसा भाई-बहन का प्यार.

हंसते मुस्कुराते भाई ने खुशी से,
प्यारी बहना को लगा लिया गले.
देख यह सुन्दर  दृश्य,मां की आंखों से,
खुशी के आँसू बह चले.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
    कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

||कर परहित के काज||

मतवाला मुख मेरे मत कह,
किसी को कटु वचन.
न रहा है न रहेगा शाश्वत,
है नश्वर मिट्टी का तन.

करतार ने दिए दो कर,
किया कर परहित के काज.
अपने रूप-रंग पर,
न कर तू इतना नाज.

हां किया तूने कठिन कर्म,
और पाया समृद्धि का अंक.
स्मरण रख सब कुछ नहीं है तेरा,
हैं कई तेरे अपने,अभी भी रंक.

नर तन नहीं दिया इसलिए,
कि कर तू कर्म नीच.
सूख रही बेल मानवता की,
तू उसे प्रेम से सींच.

खोया न रह खुद में ही,
लख कभी गैरों की निर्धनता-पीड़ा और शोक.
सार्थक होगा जीवन जब,
जीवन बन सकेगा औरों का तुमसे अशोक.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
   गाँव-केरावाही पुजारी पारा(कोण्डागाँव)

||गजब जमाना होगे||

पहिली के बेरा पुराना होगे.
बड़ गजब जमाना होगे.

भुइयाँ म गोड़ चट-चट जरत हे.
सावन म देखव तो पंखा चलत हे.
जे ल देखबे ते ह हवय परेसान.
मुड़ ल धर के चिंता म बइठे हे किसान.

मुस्किल जीना खाना होगे.
पहिली के बेरा पुराना होगे.
बड़ गजब जमाना होगे.

सुक्खा परे हे नदिया-नरवा.
पियासे तरसत हें गाय गरवा.
का हे तोर मन म,लेथस अइसन परीक्छा.
हे बिधाता थोरकिन बता कि,का हे तोर इच्छा.

घाटा के काम,खेती कमाना होगे.
पहिली के बेरा पुराना होगे.
बड़ गजब जमाना होगे.

भगवान के नहीं ए त आय मनखे तोरेच खेल.
रुक राई ल काटे,कारखाना बनाये चलाए रेल.
माटी अउ सागर के भीतरी ले निकाले,पेट्रोल-माटी तेल.
अपन गोड़ म टँगिया मारे अब तैं परसानी झेल.

अब मुस्किल परान बचाना होगे.
पहिली के बेरा पुराना होगे.
बड़ गजब जमाना होगे.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
     कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

||अजीब जमाना है!||

क्या आपने कभी भूकंप के आने का अनुभव किया है? क्या आपने खेत के अंदर अपनी मोटरसाइकिल दौड़ाई है? शायद नहीं.

परसों मैं अपनी बाई के साथ बाईक से बाई रूट कोंडागाँव हॉस्पिटल जा रहा था.हम लोग शहर के हृदय स्थल में थे. मेरे कान में हमेशा की तरह इयरफोन लगा हुआ था.(इससे हम अंतर्मुखी बनते हैं.बाहरी आवाज की दुनिया से हमारा संपर्क कट जाता है.और लोग कहते हैं कि ऐसे में शीघ्र ईश्वरप्राप्ति होती है.)

तभी मेरी पत्नी अचानक चिल्लाई-"गाड़ी रोको.गाड़ी रोको."
मैं तो बहरा बना हुआ था.उसने फिर चिल्लाया-"गाड़ी रोक न  रोगहा(छत्तीसगढ़ी नारियों की फेमस गाली)."
अब मेरे कान में कुछ जूँ रेंगा.मैंने झट से ब्रेक मारा,दोनों बाइक सहित गिरते-गिरते बचे.सड़क के दोनों ओर गाड़ियों की लाइनें लग गई.
मैंने पूछा "क्या हुआ?"
उन्होंने कहा-"सॉरी.मैं तो समझ बैठी थी कि जैसे भूकंप आ गया."

मैंने उनके  अंदाजा लगाने के हुनर को माथा पीटकर सलाम किया.

वैसे बरसात में शहरों की सड़कों पर ऐसे-ऐसे गड्ढे निकल आते हैं.जिन पर से गुजरते हुए आपको खेत के अंदर गाड़ी चलाने का भ्रम होता है और धरती डोलती हुई महसूस होती है.और उन गड्ढों में भरे पवित्र जल के छींटे जब आपके कपड़ों या शरीर के कुछ हिस्सों को छू जाए,तो आप को गंगा स्नान का पुण्य फल प्राप्त होता है.

हाल ही में  इसी नगर के सरदार पेट्रोल पंप के निकट बने डिवाइडर पर रेलिंग तोड़ते हुए,एक बस चढ़ गई थी.
लोगों ने इसके  दुर्लभ फोटो शेयर करके बहुत नाम कमाया,और भूल गए.
पर डिवाइडर के बीचों-बीच बनी स्ट्रीट लाइट के टेढ़े-मेढ़े खंबे आज भी उसी तरह उपेक्षित पड़े हैं,जैसे आज-कल लोग वृद्धावस्था में अपने मां बाप को छोड़ देते हैं.रात अमावस की रात प्रतीत होती है, और दुर्घटनाओं की  आशा बनी रहती है.(फिलहाल तो अभी तक नहीं हुई है )खैर इस विषय में ज्यादा सोचने या बात करने की आवश्यकता नहीं है.क्योंकि अभी तो हमारे हाथ पैर साबुत हैं न?जब कोई दुर्घटना हो जाएगी तब देखा जाएगा.
लेटलतीफी तो हमारी भारतीय परंपरा है.हम मरीज को इतनी देरी से अस्पताल पहुँचाते हैं कि हॉस्पिटल में एडमिट करने के कुछ देर बाद डॉक्टर कह देता है-"ओह!आई एम सॉरी."
शरीर तो एक दिन मिटने ही वाला है फिर इसकी देखभाल भला क्यों की जाए.

आज दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनकी कथनी और करनी अलग हो.माया-मोह का त्याग करने की बात करने वाले दिन रात माया से लिपटे रहते हैं.
कुछ दिन पहले सरकारी शराब दुकान के पास से गुजरा.एक महाशय चेहरे पर स्कार्फ बांध कर शराब ले रहे थे.किसी पुरुष के चेहरे पर नकाब देखकर मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि यह तो नारियों की परंपरा है.
पर मैं उसे पहचान गया.
ये वही महापुरुष थे जो कुछ दिनों पहले एक मंच पर चढ़कर लोगों को नशा मुक्ति का पाठ पढ़ा रहे थे.
जब मैंने उनकी नाम लिया तो वे चौंक पड़े.

उन्होंने सफाई दी-"दरअसल मेरे पिताजी की तबीयत बहुत बिगड़ गई है,और उन्होंने इसकी डिमांड की है. इसलिए उनके हित के लिए ये व्हिस्की खरीद कर ले जा रहा हूं."
मैंने भी कह दिया-"यदि हमारे देश में  सभी लोग आप जैसे पितृभक्त हो जाएँ न तो देश तो विकास पथ पर सरपट दौड़ पड़ेगा."

हर्षातिरेक होकर मैंने उस श्रवण कुमार के पैर छू लिए.

क्या आप जानते हैं कि ज्ञान क्यों अर्जित किया जाता है?इसलिए कि दूसरों के आगे स्वयं के ज्ञानी होने का दंभ भरा जाए. स्वयं को दूसरों  से श्रेष्ठ साबित किया जा सके.इसलिए कई जीनिसय व्यक्ति ज्ञान तो बाँटते हैं,किंतु उस रास्ते पर वे खुद कभी नहीं चलते.

शहर में रहने वाले अधिकारियों को गांवों की गंदगियाँ बहुत जल्दी नजर आ जाती है.गाँवों को ओ डी एफ घोषित कर सफाई और स्वच्छता पर जोर दिया जा रहा है,पर शहर में कचरों के अंबार,बदबूदार नालियों और गंदे सार्वजनिक प्रसाधन स्थलों पर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती. कहीं आपने उन्हें देख लिया  तो फिर आपको दिनभर उपवास ही रखना पड़ेगा.किसी को अपनी बुराई कहाँ नजर आती है, हमें तो बस दूसरों के दोषों को देखने में ही आनंद मिलता है.

हम क्या करें?
कुछ नहीं बस भगवान नीलकण्ठ पर विश्वास करके कठिनाइयों के कठिन गरल को अमृत मान कर पीते रहें.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
   कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

चाटी_भाजी

 बरसात के पानी से नमी पाकर धरती खिल गई है.कई हरी-भरी वनस्पतियों के साथ ये घास भी खेतों में फैली  हुई लहलहा रही है.चाटी (चींटी) क...