मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

||चलते रहो||

कभी तो मिलेगी मंज़िल चलते रहो.
चाहे जो भी हो हासिल चलते रहो.

मतलबी जहाँ में न कर किसी पे यकीं,
ताक में खड़ा है कातिल चलते रहो.

हार से लेते रहो कोई न कोई सबक,
बन जाओगे काबिल चलते रहो.

मेहनत कर,और रख खुद पे भरोसा,
कुछ भी नहीं है मुश्किल चलते रहो.

तुम पे आज हँसती है तो हँसने दो,
कल सलाम करेगी महफिल चलते रहो.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||ग्रामीण जनजीवन का हिस्सा:दातुन||

रोज सुबह उठने के बाद मुँह धोया जाता है व दाँतों की सफाई की जाती है.इसके लिए ब्रश,टूथपेस्ट व जीभी का उपयोग किया जाता है.जो न केवल पर्यारण को नुकसान पहुचाते हैं,बल्कि टूथपेस्ट में मिलाए गए कैमिकल्स भी मसूड़ों के लिए तकलीफदेह साबित होते हैं.पर गाँवों में आज भी दाँतों की सफाई के लिए दातुन ही उपयोग में लाया जाता है.

गाँवों में पेड़-पौधों की अधिकता के कारण दातुन बड़ी आसानी के उपलब्ध हो जाता है.पेड़ की टहनियों से प्राप्त ये दातौन ऊंगलियों के बराबर पतले व 20-30 से.मी. तक लम्बे होते हैं.दातुन करने के लिए अलग से टूथपेस्ट की जरूरत नहीं होती.केवल दाँतों से कूची बनाकर दाँत साफ कर लिए जाते हैं.कुछ लोग दातुन के साथ नमक व कोयले का उपयोग दंत मंजन के रूप में करते हैं.दातुन करने के बाद इन्हें बीच से फाड़कर दो भाग कर लिया जाता है तथा उन्हें बीच से यू आकार में मोड़कर व जीभ साफ कर फेंक दिया जाता है. प्राय: साल,करंज,नीम,कहुआ(अर्जुन),महुआ,साजा,बेर,इमली,छींद,बबूल आदि के दातौन उपयोग में लाए जाते हैं.कड़वे व कसैला स्वाद वाला दातुन दाँतों के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है.दातुन का रस लार के साथ शरीर के भीतर जाकर हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.दातुन सूख न जाएँ इसलिए उन्हें पानी में डुबाकर रखा जाता है.गाँव की औरतें जब भी जंगल जाती हैं तब लकड़ी,पान और दातुन अपने साथ जरूर लाती हैं.कई औरतें शहर में दातुन विक्रय कर आय भी अर्जित करती हैं.
इस प्रकार दातुन ग्रामीण जनजीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है.यह एकदम सस्ता और पर्यावरणहितैषी है.
गाँव में असुविधाओं के बीच रहना कइयों के लिए सजा है.पर वृक्षों की शीतल छाँव में जीने का अपना एक  अलग ही मजा है.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||पूनी दिन||

कारतिक मइना,
काय मंजा पूनी दिन.
उदलिसे पंडरी जोन उपरे.
अरु घसरायसे मंजपुर ने,
चांदी असन छकछका उजुर.
उजुर ने सब दखा दयेसे.
अमली-आमा,सींद-सलफी,
बाँवोस-सिवना,महू-सरगी.
जमाय ठीया आसत,ओग्गाय.
होलासत बे हरिक आज,
रसया उजुर ने नहाउन.
नंदी-तरई चो पानी ने बले,
लहर संग नाचेसे जोन सुँदरी.
सीतकार चो बेरा.
लोग बसलासत कोठार ने,
मंजी आइग के धरउन.
उचलासत जोंधरा,
गोटयासत सुक-दुक चो गोट के.
सुरता करसत आगे बेरा चो.
पूरे चो गोटुल चो.
पूरे चो सियान मन चो कीरति चो.
पूरे चो धरम अरु सतजुग चो.
बलसत बेर-जोन तो केबय नी पलटला.
मान्तर मनुक आज कितरो पलटलो.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||धान मिसाई||

छत्तीसगढ़ में धान,मक्का,ज्वार,कोदो-कुटकी,मंडिया,रामतिल,तिल,उड़द,मूँग,कुलथी
जैसे अनाज,दलहन व तिलहन फसलें उगाई जातीं हैं.
धान प्रमुख फसल होने के कारण यह धान का कटोरा कहलाता है.आजकल धान की कटाई के बाद धान मिसाई का काम जोरों पर है. धान मिसाई के कई तरीके यहाँ प्रचलित हैं.

आइए कुछ तरीकों के बारे में जानें.

1.आदमी के पैरों से:-पकने की अवधि के आधार पर धान दो तरह के होते हैं.लम्बी अवधि में तैयार होने वाला धान माई व जल्दी पकने वाला धान तुरिया कहलाता है.तुरिया धान मैदानी इलाकों में व बहुत कम मात्रा में बोया जाता है.बस्तर में इसकी मिसाई पैरों से ही कर ली जाती है.

2.दौरी फाँदना:-कोठार के बीचों बीच लकड़ी का एक खंभा होता है.खंभे से रस्सी द्वारा तीन-चार बैलों को जोड़कर धान के उपर चारों ओर घुमाया जाता है. धान के अलग हो जाने तक यह प्रक्रिया चलती रहती है.

3.बेलन द्वारा:-कोठार में धान की बालियों को गोलाई में बिखेर दिया जाता है.फिर बेलन की सहायता से धान की मिजाई की जाती है.बैलों को पीछे से या बेलन के ऊपर बैठकर हाँका जाता है.धान अलग हो जाने तक फसल को दो-तीन उलट-पलटकर उस पर बेलन चलाया जाता है.

4.ट्रैक्टर द्वारा़:-ट्रैक्टर से की जाने वाली मिसाई भी बिल्कुल बेलन की मिसाई के समान है क्योंकि इसमें भी वही क्रम अपनाना होता है.अंतर बस इतना है कि इससे कम समय में उसकी अपेक्षा अधिक काम हो जाता है.

5.थ्रैशर से:-मशीनों ने आदमी के जीवन को एकदम अासान बना दिया है.अब धान की मिसाई के लिए लोग थ्रैशर मशीन का ही उपयोग करते हैं.यह सबसे कम समय लेता है.इसमें चावलयुक्त व चावलरहित धान स्वत: अलग हो जाते हैं.जबकि अन्य तरीकों में धान को सूप या पंखे की सहायता से अलग करने की विधि अपनानी पड़ती है.

आज वैज्ञानिक तरीकों ने मनुष्य की जीवन शैली को बदल दिया है.आज आदमी के पास समय ही समय है.पर ये उसी पर निर्भर है कि वह उस समय का सदुपयोग करे या दुरुपयोग.

✍ अशोक नेताम "बस्तरिया"

||मय बोट दएँदे||

मय बलते रहें कि
एसु बोट नी दँयें.
मान्तर अदाँय,
मँय बोट देउ चे आँय.
बोट दिन लाइन ने ठाड़े रहुन,
अरु धरुन बोटर कारड के.
मय दखेंदे बाट ,
मचो बोट देतो पारी अमरतो चो.

हुसने,
जसन बाट दखलें मैं तुचो,
मचो सकत भर.

बोट अमरलो ने जसन,
नेतामन छोलसत बड़े-बड़े.
असन करेंदे,उसन करेंदे.
जे माँगासे,हुन दँयदें.
आउर जीतने ने हुनिमन,
मुरुम सड़क ने धुड़का उड़ाते,
टींट-टींट करते जासत,
झाकुन दखत बले नहीं.
पूछत नहीं
कि कोन जिवला-कोन मरला
हुनि नेता असन तुय बले,
मके दिलीस धोका.
दखाउन रंग-रंग चो सपना.

मके छांडुन एकलाय,
होउन गेलिस आउर चो.
तुय काय जानिस आज कितरो,
चिपा होयसे मके दार-चाउर चो.
हाय तुके मय नी चिनलें.
तुचो असन लबरा के पतयालें.

मचो एक झन चो,
बोट नी दीलो ने,
राजा बनुन जायदे,
तुचो असन चो कोनी ठग.
आउर पाँच साल चुहकेदे,
गरीब जनता चो रकत के,
पानी चो जड़ु असन.

हुनि ने बारा तारिक ने,
एक दिन काजे,
मचो जमाय काम के छाँडुन,
मय बोट देउक जायँदें.
बोटिंग ठान ने जाउन, ,
मसीन चो बटन के चेपाँयदे.
आउर अंडकी चो सिहई के,
सबके हरिक होउन मय दखाँयदे.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

||वही मनुष्य है||

विपत्तियाँ परीक्षा लेती हैं सबकी,
विकट परिस्थियों में भी जो धीर धरे.
वही मनुष्य है.

रंग रूप जैसा भी हो सब संतान हैं ईश्वर की.
सबसे समता का व्यवहार करे.
वही मनुष्य है.

क्यों न मृत्यु ही सामने आकर खड़ी हो जाए,
धर्म और सत्य के पथ से न टरे.
वही मनुष्य है.

स्वयं हँसता रहे सदा जो,
और सबके जीवन में प्रसन्नता के रंग भरे.
वही मनुष्य है.

मात-पिता की करे सेवा.
अपने जन्मभूमि के सम्मान के लिए जिये-मरे.
वही मनुष्य है.

परमपिता परमात्मा को जो देखे सबके भीतर.
हिंसा-छल-कपट से हमेशा रहे परे.
वही मनुष्य है.

अपनी पीड़ा पर अश्रु तो सभी बहाते हैं,
पर जो औरों की पीड़ा हरे.
वही मनुष्य है.

✍अशोक कुमार नेताम

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

||मैं दीया हूँ||

मैं दीया हूँ.
तुम्हारी तरह सजीव तो नहीं
पर औरों के लिए मैं जलता हूँ,
जीवन के अंतिम क्षण तक.

मैं जलता हूँ..

ताकि मेरे आलोक में
बढ़ सके कोई दिक्भ्रमित पथिक,
अपने लक्ष्य की ओर.

ताकि मेरे आगे करबद्ध हो,
कोई माँ करे ईश्नर से प्रार्थना
अपने पुत्र के लम्बी उम्र की .

ताकि मेरी रौशनी में पढ़ सके,
उस गाँव का गरीब बच्चा,
जहाँ नहीं पहुँच सकी है
बिजली अाज तक.

तुमने खड़े कर रखे हैं,
जहाँ में कई मजहबी दीवार.
पर मेरा कोई मजहब नहीं,
हिन्दू हो या मुस्लिम,
सिक्ख हो या इसाई.
मैं घर-घर बाँटता हूँ रौशनी.
और लाता हूँ सबके जीवन में खुशियाँ.

हाँ जलते हुए पीड़ा होती है मुझे,
पर देखके औरों के चेहरे पे रौनक,
मैं भूल जाता हूँ अपने सारे दर्द.

दुनिया हँसती है हँसे,
अपने रास्ते चलता रहूँगा.
औरों से जलना नहीं आता,
बस औरों के लिए जलता रहूँगा.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

चाटी_भाजी

 बरसात के पानी से नमी पाकर धरती खिल गई है.कई हरी-भरी वनस्पतियों के साथ ये घास भी खेतों में फैली  हुई लहलहा रही है.चाटी (चींटी) क...