गीदम-जगदलपुर मार्ग से उत्तर दिशा की ओर आरापुर गाँव में दो आदिवासी युवतियाँ सिर पर डलिये में कुछ ले जा रहीं थीं.हल्बी(भाषा)में पूछने पर उन्होंने बताया-''तेतर.''
मैंने समझा नहीं,झाँककर देखा तो समझ गया.खाने को माँगने पर उन्होंने कहा कि ये गंदे हो गए हैं.तेतर खाना हो तो कभी फुर्सत में आना.तेतर भले खाने को न मिला,पर उनकी तस्वीर लेने का मौका तो मुझे मिल ही गया.इस चित्र में ये औरतें तेतर वृक्ष की छाँव में ही खड़े हैं.तेतर यानी कि इमली.यह भोजन में खटाई के लिए प्रयुक्त होती है.व्यापारी प्राय: छिलकारहित व साबुत इमली क्रय करते हैं.ये हर वर्ष 20 से 25 रु.प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है.बाजारों में लोग छिलकारहित इमली भी बेचते हैं.इस प्रकार यह लोगों की आय का अच्छा स्त्रोत है.हाँ,बेमौसम बारिश हो जाने पर इसका भाव गिर जाता है.वैसे आप तो जानते ही हैं कि बस्तर एशिया की सबसे बड़ी इमली मंडी के रुप में विख्यात है.
मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019
||तेतर||
||वक्त बदल जाएगा||
खुशियों के रौशनी से,
ग़म का पहाड़ पिघल जाएगा.
हमेशा ऐसा नहीं रहेगा,
वक़्त एक दिन बदल जाएगा.
हरदम कहाँ,
अंधेरा होता है.
हर रात के बाद,
सवेरा होता है.
फैलेगा चारों ओर उजाला,
जब ज्ञान का दीया जल जाएगा.
बदलाव के लिए तू,
कमर कस ले आज.
कल तेरी मुट्ठी में होगा,
कामयाबी का ताज.
मत कर आराम,चलता चल,
सबसे आगे निकल जाएगा.
गिरने पे तेरे हँसेगा जग,
कहेगा तुम्हें जोकर.
बैठ न जाना ऐसे में,
तुम कहीं निराश होकर.
मंजिल तक पहुँचेगा वही,
जो गिरके संभल जाएगा.
समय के आगे,
हर आदमी झुकेगा.
ये न रुका है,
और न कभी रुकेगा.
अभी सुबह हुई,होगी दोपहर,
धीरे-धीरे दिन भी ढल जाएगा.
✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
||मेरे मीत,मत हो भयभीत||
मेरे मीत.
हार से मत हो भयभीत.
आज जीवित हो,
भले कल तक थे मृत.
अपनी विफलताओं को,
कर दे विस्मृत.
भूल जा अपना दुखद अतीत.
रवि कब नहीं निकला?
कभी छोड़ा नदी ने बहना?
थमना तो मृत्यु है,
जीवन है सतत चलते रहना.
न सोच क्या वर्षा,घाम,शीत.
करनी है तुम्हें,
एक नए जगत की सृष्टि.
न भटकना,रखना सदैव
अपने लक्ष्य पर दृष्टि.
अवश्य होगी तुम्हारी जीत.
खुद को
कसौटियों पे कसते रहो.
दुख हो सुख हो,
हमेशा हँसते रहो.
गाओ नित खुशियों के गीत.
जगत मंच पर,
अपनी भूमिका निभाना है.
नाटक खत्म कि इक दिन,
सबको लौट जाना है.
यही दुनिया की रीत.
✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
||पूनि होयदे||
अघन महीना,पूनि दिन.
उदलिसे पंडरी जोन सुँदरी.
कोठार ने बिकरलो आसे धान.
बैला मन के हाँकुन,
हुता बेलन किंजरालो मालू.
झड़ली धान तेबे
आपलो बायले-पीलामन संग,
फोपड़ुन-सकलुन,गुचालो पैरा मन के.
खिंडिक पैरा के जराउन,
मालू बनालो करया मस.
आउर धान दीबा चो एक भोंआर,
झीकलो डांड.
बलुन कि चोरुन नी नेओत,
डुमा मन हुनचो धान के.
आउर बनालो पैरा के अलटुन,
एक झन डोकरा.
हुन करुआय राखा अदाँय,
धान के रात भर कोठार ने.
पाछे मंगलदई भात आनली,
पूरे दिली हुन भात डोकरा के.
फेर जमाय झन संगे बसुन खादला,
भात-साग हुनि लगे.
काय मंजा साग,
कोचई संग झिर्रा टोपा.
पीला मन सवला,
ओड़ुन साल के.हुनि आगि धड़ी.
आमा रुक खाले बसलासत
मालू अरु मंगलदई.
आगि लुठा डिगडिगलिसे.
मंगलदई बलली-
"कमउन्से कितरो साल ले,
फेर छेरी चो लेंड़ी चारेच अंगुर.
आमचो जीवना ने बले केबेय पुनि होयदे?"
"पुनी होयदे रे होयदे.
आमि पीलामन के इसकूल पठाउनसे.
आपुन भुके रहुन हुन मनके खोआनसे.
दखसे एइ मन काली गियान पाउन,
आमचो जीवना ने उजर भरदे.
आउर अछा काम करुन,
आपलो नाव के अम्मर करदे."
मालू बिस्वास करुन बललो.
✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
(फोटो:-इन्टरनेट से)
||शान्ति||
औरों की तरह,
मैं भी चाहता था उसे.
बड़ी तीव्र इच्छा थी,
उसे पाने की.
कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा उसे.
मन्दिरों के चक्कर काटे.
देवों के आगे,
सिर झुकाया.
कि प्राप्त हो जाए,
वो मुझे एक बार.
फिर आनन्द से,
भर जाएगा मेरा संसार.
पर भटकना मेरा,
उसकी खोज में यत्र-तत्र,
नहीं हुआ सार्थक.
किन्तु जगत को विस्मृत कर,
नेत्र बन्द करके और साधकर-
चञ्चल मन अश्व को.
जैसे ही झाँका,मैंने अपने भीतर.
मुझे वो(शान्ति)मिल गई.
✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
||चलते रहो||
कभी तो मिलेगी मंज़िल चलते रहो.
चाहे जो भी हो हासिल चलते रहो.
मतलबी जहाँ में न कर किसी पे यकीं,
ताक में खड़ा है कातिल चलते रहो.
हार से लेते रहो कोई न कोई सबक,
बन जाओगे काबिल चलते रहो.
मेहनत कर,और रख खुद पे भरोसा,
कुछ भी नहीं है मुश्किल चलते रहो.
तुम पे आज हँसती है तो हँसने दो,
कल सलाम करेगी महफिल चलते रहो.
✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
||ग्रामीण जनजीवन का हिस्सा:दातुन||
रोज सुबह उठने के बाद मुँह धोया जाता है व दाँतों की सफाई की जाती है.इसके लिए ब्रश,टूथपेस्ट व जीभी का उपयोग किया जाता है.जो न केवल पर्यारण को नुकसान पहुचाते हैं,बल्कि टूथपेस्ट में मिलाए गए कैमिकल्स भी मसूड़ों के लिए तकलीफदेह साबित होते हैं.पर गाँवों में आज भी दाँतों की सफाई के लिए दातुन ही उपयोग में लाया जाता है.
गाँवों में पेड़-पौधों की अधिकता के कारण दातुन बड़ी आसानी के उपलब्ध हो जाता है.पेड़ की टहनियों से प्राप्त ये दातौन ऊंगलियों के बराबर पतले व 20-30 से.मी. तक लम्बे होते हैं.दातुन करने के लिए अलग से टूथपेस्ट की जरूरत नहीं होती.केवल दाँतों से कूची बनाकर दाँत साफ कर लिए जाते हैं.कुछ लोग दातुन के साथ नमक व कोयले का उपयोग दंत मंजन के रूप में करते हैं.दातुन करने के बाद इन्हें बीच से फाड़कर दो भाग कर लिया जाता है तथा उन्हें बीच से यू आकार में मोड़कर व जीभ साफ कर फेंक दिया जाता है. प्राय: साल,करंज,नीम,कहुआ(अर्जुन),महुआ,साजा,बेर,इमली,छींद,बबूल आदि के दातौन उपयोग में लाए जाते हैं.कड़वे व कसैला स्वाद वाला दातुन दाँतों के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है.दातुन का रस लार के साथ शरीर के भीतर जाकर हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.दातुन सूख न जाएँ इसलिए उन्हें पानी में डुबाकर रखा जाता है.गाँव की औरतें जब भी जंगल जाती हैं तब लकड़ी,पान और दातुन अपने साथ जरूर लाती हैं.कई औरतें शहर में दातुन विक्रय कर आय भी अर्जित करती हैं.
इस प्रकार दातुन ग्रामीण जनजीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है.यह एकदम सस्ता और पर्यावरणहितैषी है.
गाँव में असुविधाओं के बीच रहना कइयों के लिए सजा है.पर वृक्षों की शीतल छाँव में जीने का अपना एक अलग ही मजा है.
✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
चाटी_भाजी
बरसात के पानी से नमी पाकर धरती खिल गई है.कई हरी-भरी वनस्पतियों के साथ ये घास भी खेतों में फैली हुई लहलहा रही है.चाटी (चींटी) क...
-
शांति का पति बहुत मेहनती और चतुर था.वह उनके साथ बहुत खुश थी.पर उसे अपने पति का नाम बिल्कुल पसंद नहीं था.उनके पति का नाम था बुद्धूराम.शांति न...
-
शिक्षित और युवा व्यक्ति के पास कोई काम का न होना सचमुच दुखद है. हरपाल सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही था.गांव में थोड़ी बहुत जमीन थी पर उससे परिवा...
-
बाजारों में रेशमी वस्त्रों की बहुत माँग होती है.आकर्षक,चमकदार रंग और सर्दी-गर्मी दोनों मौसम में अनुकूल होने के कारण रेशमी वस्त्र लोगो...