मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

||रखिया बड़ी||

बड़ी की बात करें तो दुकानों में प्राय: सोयाबीन की बड़ी ही उपलब्ध होती है.जो सस्ती और मजेदार तो होती है,लेकिन अपने घर पर,अपने हाथों से बनाई रखिया बड़ी के स्वाद के आगे हर स्वाद फीका है.बड़ियाँ तलने की खुशबू से ही मुँह में पानी आ जाता है.रखियाके अलावा अरबी,केऊ(स्थानीय कंद),पपीता,मूली,पत्ता गोभी,फूलगोभी आदि से बड़ी बनाई जाती है.इन सबसे बड़ी बनाने की विधि एक जैसी ही है.
आइए रखिया बड़ी बनाने के लिए हमें चाहिए एक रखिया,उड़द की दाल,हरा धनिया,मेथी,अदरक आदि.

क्या है रखिया?
रखिया कुम्हड़ा प्रजाति का पौधा है.रखिया के चारों ओर राख की परत होने के कारण इसे "रखिया कुम्हड़ा" कहते हैंं.यह बहुत.इसी से पेठा बनाया जाता है.

सबसे पहले रखिया को टुकड़ों में काट लें व बीज अलग कर लें और इसे कद्दूकस कर लें.अब कपड़े से छानकर इसका पानी निकाल लें.रात भर भिगाए गए उड़द दाल में से छिलके निथारकर अलग कर लें.अब दाल को सील बट्टे या मिक्सर से पीस लें.पिसी दाल और रखिया के पेस्ट को एक में मिलाकर फेंट ले.धनिया,मेथी,अदरक आदि भी डाल दें.अब इसे धूप में साफ कपड़े पर एक-दो अंगुल की दूरी गोल-गोल रखते जाएँ.तीन चार दिनों में बड़ियाँ अच्छी तरह सूख जाने पर किसी डिब्बे में भरकर रख लें.जब भी बड़ी खानी हो शौक से बना लीजिए.आप जब-जब रखिया बड़ी की सब्ज़ी खाएँगे तब-तब आपको अपनी मिट्टी से जुड़े होने का सुखद अहसास होगा.

||तेतर||

गीदम-जगदलपुर मार्ग से उत्तर दिशा की ओर आरापुर गाँव में दो आदिवासी युवतियाँ सिर पर डलिये में कुछ ले जा रहीं थीं.हल्बी(भाषा)में पूछने पर उन्होंने बताया-''तेतर.''
मैंने समझा नहीं,झाँककर देखा तो समझ गया.खाने को माँगने पर उन्होंने कहा कि ये  गंदे हो गए हैं.तेतर खाना हो तो कभी फुर्सत में आना.तेतर भले खाने को न मिला,पर उनकी तस्वीर लेने का मौका तो मुझे मिल ही गया.इस चित्र में ये औरतें तेतर वृक्ष की छाँव में ही खड़े हैं.तेतर यानी कि इमली.यह भोजन में खटाई के लिए प्रयुक्त होती है.व्यापारी प्राय: छिलकारहित व साबुत इमली क्रय करते हैं.ये हर वर्ष 20 से 25 रु.प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है.बाजारों में लोग छिलकारहित इमली भी बेचते हैं.इस प्रकार यह लोगों की आय का अच्छा स्त्रोत है.हाँ,बेमौसम बारिश हो जाने पर  इसका भाव गिर जाता है.वैसे आप तो जानते ही हैं कि बस्तर एशिया की सबसे बड़ी इमली मंडी के रुप में  विख्यात है.

||वक्त बदल जाएगा||

खुशियों के रौशनी से,
ग़म का पहाड़ पिघल जाएगा.
हमेशा ऐसा नहीं रहेगा,
वक़्त एक दिन बदल जाएगा.

हरदम कहाँ,
अंधेरा होता है.
हर रात के बाद,
सवेरा होता है.
फैलेगा चारों ओर उजाला,
जब ज्ञान का दीया जल जाएगा.

बदलाव के लिए तू,
कमर कस ले आज.
कल तेरी मुट्ठी में होगा,
कामयाबी का ताज.
मत कर आराम,चलता चल,
सबसे आगे निकल जाएगा.

गिरने पे तेरे हँसेगा जग,
कहेगा तुम्हें जोकर.
बैठ न जाना ऐसे में,
तुम कहीं निराश होकर.
मंजिल तक पहुँचेगा वही,
जो गिरके संभल जाएगा.

समय के आगे,
हर आदमी झुकेगा.
ये न रुका है,
और न कभी रुकेगा.
अभी सुबह हुई,होगी दोपहर,
धीरे-धीरे दिन भी ढल जाएगा.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||मेरे मीत,मत हो भयभीत||

मेरे मीत.
हार से मत हो भयभीत.

आज जीवित हो,
भले कल तक थे मृत.
अपनी विफलताओं को,
कर दे विस्मृत.

भूल जा अपना दुखद अतीत.

रवि कब नहीं निकला?
कभी छोड़ा नदी ने बहना?
थमना तो मृत्यु है,
जीवन है सतत चलते रहना.

न सोच क्या वर्षा,घाम,शीत.

करनी है तुम्हें,
एक नए जगत की सृष्टि.
न भटकना,रखना सदैव
अपने लक्ष्य पर दृष्टि.

अवश्य होगी तुम्हारी जीत.

खुद को
कसौटियों पे कसते रहो.
दुख हो सुख हो,
हमेशा हँसते रहो.

गाओ नित खुशियों के गीत.

जगत मंच पर,
अपनी भूमिका निभाना है.
नाटक खत्म कि इक दिन,
सबको लौट जाना है.

यही दुनिया की रीत.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||पूनि होयदे||

अघन महीना,पूनि दिन.
उदलिसे पंडरी जोन सुँदरी.
कोठार ने बिकरलो आसे धान.
बैला मन के हाँकुन,
हुता बेलन किंजरालो मालू.
झड़ली धान तेबे
आपलो बायले-पीलामन संग,
फोपड़ुन-सकलुन,गुचालो पैरा मन के.
खिंडिक पैरा के जराउन,
मालू बनालो करया मस.
आउर धान दीबा चो एक भोंआर,
झीकलो डांड.
बलुन कि चोरुन नी नेओत,
डुमा मन हुनचो धान के.
आउर बनालो पैरा के अलटुन,
एक झन डोकरा.
हुन करुआय राखा अदाँय,
धान के रात भर कोठार ने.
पाछे मंगलदई भात आनली,
पूरे दिली हुन भात डोकरा के.
फेर जमाय झन संगे बसुन खादला,
भात-साग हुनि लगे.
काय मंजा साग,
कोचई संग झिर्रा टोपा.
पीला मन सवला,
ओड़ुन साल के.हुनि आगि धड़ी.
आमा रुक खाले बसलासत
मालू अरु मंगलदई.
आगि लुठा डिगडिगलिसे.
मंगलदई बलली-
"कमउन्से कितरो साल ले,
फेर छेरी चो लेंड़ी चारेच अंगुर.
आमचो जीवना ने बले केबेय पुनि होयदे?"

"पुनी होयदे रे होयदे.
आमि पीलामन के इसकूल पठाउनसे.
आपुन भुके रहुन हुन मनके खोआनसे.
दखसे एइ मन काली गियान पाउन,
आमचो जीवना ने उजर भरदे.
आउर अछा काम करुन,
आपलो नाव के अम्मर करदे."
मालू बिस्वास करुन बललो.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"
(फोटो:-इन्टरनेट से)

||शान्ति||

औरों की तरह,
मैं भी चाहता था उसे.
बड़ी तीव्र इच्छा थी,
उसे पाने की.
कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा उसे.
मन्दिरों के चक्कर काटे.
देवों के आगे,
सिर झुकाया.
कि प्राप्त हो जाए,
वो मुझे एक बार.
फिर आनन्द से,
भर जाएगा मेरा संसार.
पर भटकना मेरा,
उसकी खोज में यत्र-तत्र,
नहीं हुआ सार्थक.
किन्तु जगत को विस्मृत कर,
नेत्र बन्द करके और साधकर-
चञ्चल मन अश्व को.
जैसे ही झाँका,मैंने अपने भीतर.
मुझे वो(शान्ति)मिल गई.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||चलते रहो||

कभी तो मिलेगी मंज़िल चलते रहो.
चाहे जो भी हो हासिल चलते रहो.

मतलबी जहाँ में न कर किसी पे यकीं,
ताक में खड़ा है कातिल चलते रहो.

हार से लेते रहो कोई न कोई सबक,
बन जाओगे काबिल चलते रहो.

मेहनत कर,और रख खुद पे भरोसा,
कुछ भी नहीं है मुश्किल चलते रहो.

तुम पे आज हँसती है तो हँसने दो,
कल सलाम करेगी महफिल चलते रहो.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

चाटी_भाजी

 बरसात के पानी से नमी पाकर धरती खिल गई है.कई हरी-भरी वनस्पतियों के साथ ये घास भी खेतों में फैली  हुई लहलहा रही है.चाटी (चींटी) क...