गुरुवार, 11 जुलाई 2019

हार के बाद ही जीत है

साल 20011 का.खेत में काम करते विविध भारती सुन रहा था.सखी सहेली कार्यक्रम में एक महिला ने बड़ा शानदार खत लिखा था.सुनकर मन गदगद हो गया.चिट्ठी कुछ इस तरह की थी.

"नमस्कार!.....मेरे पति क्रकेट के दीवाने हैं.2003 के वर्ल्ड कप फाइनल के दिन उन्होंने ढेर सारे पटाखे खरीद लाए.मुझसे बोले देखना आज विश्व विजेता बनकर रहेगा.पर भारत की 125 रनों  से  करारी हार के बाद वो टूट से गए.
कुछ देर बाद वे संभलकर बोले-भारत जीतेगा और जरूर जीतेगा आज नहीं तो कल जातेगा.और उस दिन मैं ये पटाखे चलाऊँगा,कहकर उन्होंने वो पटाखे आलमारी में संभलकर रख दिए.2007 में भारत बंग्ला देश और श्रीलंका शिकस्त खाकर पहले दौर में ही बाहर हो गया.पर मेरे पति को यकीन था कि कभी न कभी वो दिन आएगा जब उनके आलमारी में रखे पटाखों की शोर से सारा मोहल्ला गूँज उठेगा.

और 8 साल बाद वो दिन आ ही गया.2अप्रैल  2011का दिन हमारे लिए हमेशा-हमेशा के लिए यादगार बन गया जब भारत और श्रीलंका विश्व कप फाइनल में आमने-सामने थे.जैसे ही भारतीय कप्तान धोनी ने छक्का मारकर भारत को विश्व विजेता का खिताब दिलाया,मेरे पति झूम उठे,वे आलमारी से सारे पटाखे निकाल लाए और देर शाम तक पटाखे चलाते रहे,खुशियाँ मनाते रहे,उनकी खुशियों में मैं भी शरीक हो गई.

जिंदगी में हार से निराश होने की जरूरत नहीं है.धैर्य रखिए-निरंतर प्रयास करते रखिए.देखिएगा एक दिन ईश्वर आपकी झोली खुशियों से भर देगें."

गाने की फरमाइश कौन सी थी मुझे याद नहीं शायद ये गाना रहा हो -

ज़िंदगी की यही रीत है.
हार के बाद ही जीत है.
थोड़े आँसू हैं थोड़ी हँसी.
आज गम है तो कल है खुशी.

गुरुवार, 28 मार्च 2019

//तुमपे किताब लिखूँ//

चेहरे को कँवल-आंखों को शराब लिखूँ.
सोचता हूँ तुमपे एक किताब लिखूँ.
दिल को काग़ज,ख़यालों को बना लूँ स्याही,
फिर चर्चा-ए-हुस्न तेरा,बेहिसाब लिखूँ.
चेहरे पे इतना नूर,तू इनसान है कि हूर?
मैं हक़ीकत कहूँ तुझे कि ख्वाब लिखूँ.
कोई गर पूछे कि दिखती कैसी है वो,
तो अपने जवाब में,मैं लाजवाब लिखूँ.
मुल्कों में हिंद,महलों में ताज,
और फूलों में तुझे मैं गुलाब लिखूँ.
बेघर के लिए घर-राही के लिए मंज़िल,
प्यासे के लिए तुझे मैं आब लिखूँ.
तेरी खातिर भूल जाऊँ ख़ुदा की बंदगी,
सुबह-शाम तुझे आदाब लिखूँ.
✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

||संसार में शान्ति हो||

पाकिस्तान की नादानी के चलते,
भारत सैन्य कार्यवाही को मजबूर हुआ.
ध्वस्त हुए दहशतगर्दों के ठिकाने,
उसका हौसला चकनाचूर हुआ.
निस्संदेह आज जो कुछ भी हुआ,
वो पाक के दुष्कर्मों का फल है.
पर इससे ये नहीं समझना चाहिए
के युद्ध ही इस समस्या का हल है.
पूरे विश्व में आतंकियों के विरुद्ध,
एक बहुत बड़ी क्रांति हो.
न युद्ध हो कहीं-न अश्रु बहें किसी के,
संसार में शाश्वत शान्ति हो.

✍ए.के. नेताम

||संतोष धन||

न आँकिए किसी को
उसके मलिन वस्त्र-अर्धनग्न तन से.
क्योंकि निर्धनता का,
तनिक भी संबंध नहीं है धन से.
अन्यथा एक संपन्न व्यक्ति,
संसार का सबसे सुखी प्राणी होता.
और विपन्न व्यक्ति,
जीवन भर अपने अभावों पर रोता.
संतोष ही जीवन का,
सर्वोत्तम धन है.
ये नहीं जिसके पास,
समझो वही निर्धन है.
(तस्वीर:किरन्दुल बाजार स्थल)
ए.के.नेताम

||ये कैसी जन्नत?||

उस भयानक धमाके के बाद,
मैं जहाँ पहुँचा,
वहाँ रौशनी नहीं थी.
बिल्कुल अंधेरा था.
"उन्होंने" जन्नत का
जो पता बताया था.
ये तो कोई और ही जगह थी,
जहाँ मैं आया था.
यहाँ न सोने-चाँदी की इमारतें थी,
और न ही सोने के पेड़ थे.
पानी,दूध,शहद और शराब की नदियाँ भी,
नहीं बह रही थीं यहाँ,
यहाँ खूबसूरत आँखों वाली कोई हूर भी नहीं थी.
न कस्तूरी की खुश्बू,
न कोई सुरीली तान सुनाई दे रही थी यहाँ.
यहाँ बह रही थी नदियाँ,
अपनों के ही खून की.
माँ बेहोश थीं अपने लाल के,
लाल लहू से सने जिस्म देखकर.
बाप का कलेजा भी छलनी था,
पर था वो मौन.
सोचता अब हमारा जहाँ में
रह गया आखिर कौन?
बहनें भी रो रही थीं,
अपने भाई से लिपटकर.
पत्नियों के माथे से,
मिटाए जा रहे थे सिंदूर,
तोड़ी जा रही थीं,
कलियों सी नाजुक हाथों की चूड़ियाँ.
ज़िंदगी और मौत से अन्जान,
उन मासूमों को ये पता भी न था,
के उनके सर से पिता का साया,
उठ गया था,हमेशा-हमेशा के लिए.
देखकर ऐसे गमगीन नज़ारे,
मेरी भी आँखें नम हैं.
सच इसके बदले मुझे,
जो भी सज़ा मिले कम है.
नासमझ था मैं,
अपना-पराया समझ में नहीं आया.
अब सोचूँ अपनों को दर्द और आँसू देके,
मैंने कौन सा जन्नत पाया?

✍ए.के. नेताम

||वही मनुष्य है||

विपत्तियाँ परीक्षा लेती हैं सबकी,
विकट परिस्थियों में भी जो धीर धरे.
वही मनुष्य है.

रंग रूप जैसा भी हो सब संतान हैं ईश्वर की.
सबसे समता का व्यवहार करे.
वही मनुष्य है.

क्यों न मृत्यु ही सामने आकर खड़ी हो जाए,
धर्म और सत्य के पथ से न टरे.
वही मनुष्य है.

स्वयं हँसता रहे सदा जो,
और सबके जीवन में प्रसन्नता के रंग भरे.
वही मनुष्य है.

मात-पिता की करे सेवा.
अपने जन्मभूमि के सम्मान के लिए जिये-मरे.
वही मनुष्य है.

परमपिता परमात्मा को जो देखे सबके भीतर.
हिंसा-छल-कपट से हमेशा रहे परे.
वही मनुष्य है.

अपनी पीड़ा पर अश्रु तो सभी बहाते हैं,
पर जो औरों की पीड़ा हरे.
वही मनुष्य है.

✍अशोक कुमार नेताम

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

||रखिया बड़ी||

बड़ी की बात करें तो दुकानों में प्राय: सोयाबीन की बड़ी ही उपलब्ध होती है.जो सस्ती और मजेदार तो होती है,लेकिन अपने घर पर,अपने हाथों से बनाई रखिया बड़ी के स्वाद के आगे हर स्वाद फीका है.बड़ियाँ तलने की खुशबू से ही मुँह में पानी आ जाता है.रखियाके अलावा अरबी,केऊ(स्थानीय कंद),पपीता,मूली,पत्ता गोभी,फूलगोभी आदि से बड़ी बनाई जाती है.इन सबसे बड़ी बनाने की विधि एक जैसी ही है.
आइए रखिया बड़ी बनाने के लिए हमें चाहिए एक रखिया,उड़द की दाल,हरा धनिया,मेथी,अदरक आदि.

क्या है रखिया?
रखिया कुम्हड़ा प्रजाति का पौधा है.रखिया के चारों ओर राख की परत होने के कारण इसे "रखिया कुम्हड़ा" कहते हैंं.यह बहुत.इसी से पेठा बनाया जाता है.

सबसे पहले रखिया को टुकड़ों में काट लें व बीज अलग कर लें और इसे कद्दूकस कर लें.अब कपड़े से छानकर इसका पानी निकाल लें.रात भर भिगाए गए उड़द दाल में से छिलके निथारकर अलग कर लें.अब दाल को सील बट्टे या मिक्सर से पीस लें.पिसी दाल और रखिया के पेस्ट को एक में मिलाकर फेंट ले.धनिया,मेथी,अदरक आदि भी डाल दें.अब इसे धूप में साफ कपड़े पर एक-दो अंगुल की दूरी गोल-गोल रखते जाएँ.तीन चार दिनों में बड़ियाँ अच्छी तरह सूख जाने पर किसी डिब्बे में भरकर रख लें.जब भी बड़ी खानी हो शौक से बना लीजिए.आप जब-जब रखिया बड़ी की सब्ज़ी खाएँगे तब-तब आपको अपनी मिट्टी से जुड़े होने का सुखद अहसास होगा.

चाटी_भाजी

 बरसात के पानी से नमी पाकर धरती खिल गई है.कई हरी-भरी वनस्पतियों के साथ ये घास भी खेतों में फैली  हुई लहलहा रही है.चाटी (चींटी) क...