शनिवार, 15 जुलाई 2017

||मिलेगा सुख||

नहीं है साधन सोचकर
बैठ व्यर्थ समय न खोना.
किसी भी असफलता से,
कभी तुम निराश न होना.

क्योंकि असफल व्यक्ति ही,
चखता है सफलता का स्वाद.
एक प्यासा ही,
जान सकता है जल का महत्व.
एक भूखा ही जानता है,
भोजन करने का आनंद.
एक परास्त प्रेमी ही,
जानता है सच्चे प्रेम की परिभाषा.
एक अंधा ही अनुभव कर सकता है,
एक लाठी की महत्ता.

इसलिए वर्तमान परिस्थितियों पर,
न कर फीका अपना सुन्दर मुख.
वो आता है तो,और भी मुस्कुरा
खुद भयभीत हो,भाग जाएगा दुख.
सतत कर्म कर,मन में धीरज धर,
आज नहीं तो कल,अवश्य मिलेगा तुझे सुख.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
     कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

||ये जीवन मात्र नहीं है तेरा||

सब कुछ मिल गया मुझे,
और बन गया मैं अशोक.
अब जीवन की कोई बाधा,
न सकेगी मेरा रास्ता रोक.

सवार हूँ अब मैं,
प्रसन्नता के रथ पर.
आएगी भला कौन सी विपत्ति,
अब मेरे पथ पर.

यदि सोचता है तू ऐसा,
तो ये तेरा भ्रम है.
मूर्ख,अब तक न समझा,
कि सुख-दुख तो,
जीवन का अनवरत क्रम है.

आगे होंगी और भी बहुत सी लड़ाइयां,
जिनसे तुम्हें लड़ना है.
खत्म कर अंधेरे का साम्राज्य,
प्रकाश का नया संसार गढ़ना है.

इसलिए तनिक सी प्राप्ति पर अपनी,
तू गुब्बारे सा मत फूल.
यह जीवन,मात्र नहीं है तेरा,
खुद को याद रख,औरों को भी न भूल.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
     कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

बुधवार, 12 जुलाई 2017

||आगे सुख तो पीछे दुख है||

"बेटा इसके हर एक पेज के आगे-पीछे फोटो कॉपी कर दो."

6 पेज का एक प्रपत्र देते हुए फोटोकॉपी की दुकान में बैठे लगभग 8 साल के बच्चे से मैंने कहा.

उसने बहुत जल्द फोटो कॉपी कर दिया. फिर सिर पकड़ कर बोला-" अरे यार! पीछे के सारे पेज तो उल्टे आ गये."

ऐसा कह उसने फिर से फोटो कॉपी की.
पर इस बार भी वही नतीजा.

मैंने उससे कहा-"बेटा इस बार जरा ध्यान से कॉपी करना,नहीं तो तुम्हारे पापा तुम्हें डाँटेंगे."

"नहीं.मेरे पापा ऐसा नहीं करेंगे.ये रहे मेरे पापा!"

कहते हुए उसने एक तस्वीर की ओर इशारा किया,जिस पर फूलमाला चढ़ाई गई थी.

"ओह!"
मेरे मुंह से निकला.

"आपके पापा कैसे नहीं रहे?"

"अभी छह-सात महीने पहले ही वे शहीद हो गए."

''आप अपने पापा के बगैर रह लेते हैं?"

"हां मेरी मम्मी साथ है न.वो कहती है कि सुख दुख तो जीवन के दो अनिवार्य पहलू हैं. मुझे तो गर्व होता है कि मेरे पापा देश के लिए शहीद हुए. मैं भी बड़ा होकर सैनिक बनना चाहता हूं."

ये कहते हुए उसने मम्मी को आवाज दी.

उसकी माँ तुरंत आई.

"मम्मी मुझसे फोटोकॉपी ठीक तरह से नहीं हो रहा है."

उसकी मम्मी को मैंने गौर से देखा, क्योंकि छोटे से बालक में  ऐसे दिव्य संस्कार-विचार भरने वाली माता किसी देवी से कम नहीं थी.न माथे पर सिंदूर न हाथों में चूड़ियाँ और न कानों में बालियाँ, जीवन के  दुखों से परे  मुस्कुराती हुई.पहले तो मम्मी ने बेटे को हँसते हुए डाँटा.

"अरे यार!इतना छोटा सा काम भी आपसे नहीं हो पा रहा है.चलो मैं कर देती हूं."

उसने तुरंत फोटो कॉपियाँ कर दीं.मैं उसे लेकर वापस लौटा.

पर मैंने  अपने आप से कहा-"जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी हंसते हुए जीना तो कोई इनसे सीखे."

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
     कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

||पाँच बातें||

शिक्षित और युवा व्यक्ति के पास कोई काम का न होना सचमुच दुखद है. हरपाल सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही था.गांव में थोड़ी बहुत जमीन थी पर उससे परिवार का गुजारा होना बड़ा कठिन था.वह अपनी बूढ़ी माँ,पत्नी-बच्चों के लिए आवश्यक वस्तुएँ नहीं जुटा पाता था.इसलिए आज उसने विचार कर लिया था कि वह किसी राजा के पास जाकर कोई चाकरी ही कर लेगा.

उसे अपने परिवार से बहुत प्यार था. पर उनकी बेहतरी के लिए अपने मन को कठोर करके आज वह किसी को बिना बताए चांदनी रात में चुपचाप घर से निकल पड़ा.गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था.कुछ कुत्तों के भौंकने का स्वर सुनाई दे रहा था.
रात के अंधकार में तारे टिमटिमा रहे थे.

गांव से थोड़ी ही दूर एक बूढ़ा व्यक्ति अपनी झोपड़ी में रहता था.लोग उसे पागल कहा करते थे.पर वह जब भी कोई बात कहता,ज्ञान की बात ही कहता.हरपाल ने सोचा कि क्यों न उस बूढ़े बाबा से ज्ञान की कुछ बातें सुनता चलूँ.परदेस जा रहा हूं,न जाने कौन सा संकट आन पड़े.
सो वह उस बूढ़े की कुटिया में पहुंच गया और अपनी बात कही.
बूढ़े ने कहा बेटा परदेस जा रहे हो तो मेरी ये पांच बातें सदैव याद रखना-

1.जो तुम्हारी सेवा करे तुम ही उसकी सेवा करो.
2.किसी को दिल दुखाने वाली बात मत करना हर काम इमानदारी से करो.
3. हर काम इमानदारी से करो.
4.बिना योग्यता के दूसरों से बराबरी का दावा मत करो.
और
5.जहां भी ज्ञान की दो बातें मिले ध्यान से सुनो.

हरपाल सिंह ने उस वृद्ध की पांचों बातें गाठ बांधली और निकल पड़ा एक बड़े से नगर की ओर....|

प्रातः काल वह एक बड़े से नगर में पहुंचा.महाराज की दरबार पहुँचकर उसने प्रधान सेवक से विनय की.
प्रधान सेवक ने उसकी दिन था और सरलता से प्रभावित होकर उसने भृत्य का कार्य मिल गया.हरपालसिंह ने प्रधान सेवक का बहुत आभार माना.

एक बार राजा साजो-सामान सहित किसी यात्रा पर निकला.रास्ता लंबा था, गर्मी के दिन थे.यात्रा दल के पीने योग्य पानी समाप्त हो गया.राजा और प्रजा दोनों व्यास से व्याकुल हो उठे.

राजा ने प्रधान सेवक को आदेश दिया कि-अविलंब मेरे और सबके लिए पेयजल का प्रबंध करो अन्यथा तुम बुरे परिणाम के लिए तैयार रहो.

भयभीत प्रधान सेवक अपने साथियों के साथ वन में जल की तलाश करने निकल पड़ा पर,उनका सारा प्रयास व्यर्थ रहा.
वह यात्रा दल के पास निराश होकर वापस लौटा.

हरपाल सिंह भी निकट ही खड़ा था.उनसे उसकी यह दशा देखी न गई. क्योंकि उसी के कारण ही तो आज वह
राज दरबार की सेवा कर रहा है.
उसी बूढ़े की पहली बात याद आई-जो भी तुम्हारी मदद करें तुम भी उसकी मदद करो.

उसने प्रधान सेवक से प्रश्न किया प्रधान जी क्या आसपास कहीं पर भी जल का पता नहीं चला?
प्रधान ने कहा-हाँ हरपाल.सभी ताल नदी सूखे हुए हैं.जल का नामोनिशान तक नहीं है हां एक बावड़ी है लेकिन....|"

लेकिन क्या?-हरपाल सिंह ने पूछा.

"आसपास के लोगों ने बताया कि वहां एक भूत रहता है.आज तक जो भी उस कुएं में उतरा वो कभी वापस नहीं लौट सका.इसलिए हम में से कोई भी वहां जाने की हिम्मत न कर सका." प्रधान सेवक ने अपनी बात पूरी की.

हरपाल सिंह ने कहा-"मित्र तुमने मेरी सहायता की है तुम्हारा मुझ पर बड़ा एहसान है इसलिए मैं अवश्य जल लेने जाऊंगा."
सभी ने हरपाल सिंह को रोकना चाहा, पर हरपाल सिंह अपने दोनों हाथों में मटका लेकर निडर होकर चल पड़ा,उसी भूतिया बावड़ी की ओर.

हरपाल सिंह चलते-चलते बावड़ी के पास पहुंचा. बड़े-बड़े और ऊंचे पेड़ों के बीच घिरा हुआ वह कुआँ सचमुच डरावना लग रहा था.ऐसा प्रतीत होता था की वर्षों से यहां कोई नहीं आया है.
कुएँ से नीचे तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थी,और नीचे बिल्कुल अंधेरा था. एक बार तो हरपाल सिंह का हृदय भी काँप गया. पर वह हिम्मत करके धीमी कदमों से कुएँ से जल लेने उतरा.
बावड़ी के जल स्तर तक पहुंच कर और झुककर उसने दोनों अपने मटके पानी से भर लिए.दोनों हाथों में जल से भरे घड़े लिए वह जैसे ही ऊपर सीढ़ियां चढ़ने को तैयार हुआ. उससे ठीक सामने एक भयानक सा आदमी खड़ा था. बिल्कुल काला कलूटा बाल बड़े बड़े और बिखरे हुए.कमर से ऊपर का भाग नग्न था.और उसने किसी नर कंकाल को अपने सीने से लगाए रखा था.
हरपाल सिंह स्तंभित रह गया.

उस डरावने आदमी ने हरपाल से प्रश्न किया ओ नौजवान!मेरी पत्नी के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?
हरपाल कुछ कह नहीं जा रहा था कि उसे वृद्धि की दूसरी बात याद आई किसी के दिल दुखाने वाली बात मत करो.
उसने जवाब दिया-''ऐसी सुंदर स्त्री तो मैंने जीवन में कभी नहीं देखा."

हरपाल सिंह का उत्तर सुनकर वह व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुआ उसने कहा-" नौजवान मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं.
मैं अपनी पत्नी से इतना प्रेम करता था कि आज तक उसे लेकर यहां वहां फिर रहा हूं.आज तक जो भी इस कुएँ में आया उन सब से मैंने यही प्रश्न किया.पर उन्होंने इसे हड्डी का ढांचा कह दिया इसलिए मैंने उन सब को मार डाला. पर तुमने मेरी पत्नी की प्रशंसा करके मुझे खुश कर दिया है.बोलो नौजवान तुम क्या चाहते हो?"

हरपाल सिंह ने कहा-"मान्यवर आसपास के लोगों को आपके भय के कारण पानी नहीं मिल पाता है.
यदि आप मुझसे सचमुच प्रसन्न हैं तो कृपा करके आप इस बावड़ी को छोड़कर चले जाइए."

उस आदमी ने कहा बिल्कुल ऐसा ही होगा और तुरंत वह सदा सदा के लिए उस कुएँ को छोड़कर चला गया.

हरपाल सिंह जब मटके में पानी लेकर वापस  पहुंचा तो सबके खुशी का ठिकाना न रहा. राजा प्रजा सब को भरपूर पानी मिला.

राजा ने हरपाल सिंह से प्रसन्न होकर उसके पद और वेतन में वृद्धि कर दी.

अब हरपाल सिंह को राज्य का खजांची बना दिया गया. यानी कि  राजकोष के देखरेख का जिम्मा अब उसके ही हाथों में था. अपना काम करते हुए उसे बूढ़े की तीसरी बात हमेशा याद आती थी कि-हर काम इमानदारी से करो.

हरपालसिंह की ईमानदारी से काम करने और पाई-पाई के हिसाब रखने की वजह से भ्रष्ट कर्मचारी उससे नाराज  रहने लगे क्योंकि अब उनके अतिरिक्त आय का रास्ता बंद हो गया.

प्रधानमंत्री ने हरपालसिंह को लालच देकर कहा कि यदि तुम हमसे मिलकर रहोगे तो मैं और हमारे साथी मिलकर तुम्हें एक प्रतिष्ठित पद दिलवा देंगे.जिससे तुम्हारे सम्मान और यश में वृद्धि होगी.
पर हरपाल ने बूढ़े की चौथी बात का स्मरण किया-बिना योग्यता के किसी से बराबरी का दावा मत करो.
उसने प्रधानमंत्री का अनुचित प्रस्ताव ठुकरा दिया.

इससे नाराज होकर दूसरे ही दिन सुबह चापलूस मंत्रियों ने राजा के पास जाकर शिकायत की,कि हरपालसिंह अपने कार्य  में हेरा-फेरी करता है.और मना करने पर उसने हमें खरी-खोटी सुनाई और उसने राजपरिवार को भी अपमानजनक शब्द कहे हैं.

राजा यह सुनकर आगबबूला हो गया.उसने कहा-"हरपालसिंह का यह दुस्साहस?कि हमारे ही टुकड़ों पर पलकर हमें ही अपशब्द कहे.हम जब तक हरपालसिंह का कटा सिर नहीं देख लें,हमारे परिवार का कोई भी सदस्य पानी तक नहीं पिएगा."

राजा ने तुरंत एक सैनिक को बुलाकर उससे कहा-"सैनिक हमारे नगर से कुछ दूर के गाँव में एक भवन निर्माण का कार्य चल रहा है.आज एक व्यक्ति तुमसे आकर यह पूछेगा कि काम कितना बाकी है? यह सुनते ही तुम उसकी गर्दन काटकर मेरे पास ले आना."

राजा की आज्ञा पाकर वह सैनिक चला गया.

कुछ देर बाद राजा ने हरपाल से को अपने पास बुला कर कहा-"हरपाल सिंह पास के एक गांव में बहुत बड़ा भवन बन रहा है तुम शीघ्र जाओ और वहां के कारीगर से पूछकर आओ कि काम कितना बाकी है?

"जो आज्ञा महाराज!"

हरपाल सिंह एक घोड़े पर सवार होकर अनजाने में अपने ही मृत्यु की ओर बढ़ चला.
हरपाल सिंह अश्व पर सवार हो कुछ विचार करते हुए यात्रा में मग्न था.

उसने देखा कि रास्ते पर ही एक बड़ा सा आयोजन हो रहा था जिसमें ज्ञान की चर्चा हो रही थी. हरपाल आगे बढ़ जाना चाहता था पर उसे बूढ़े की पांचवी बात याद आई-जहां भी ज्ञान की दो बातें मिले ध्यान से सुनो.
वह घोड़े को एक वृक्ष से बांधकर कथा सुनने में रम  गया. चर्चा जब ज्ञान की हो तो समय कैसे बीत जाता है,पता ही नहीं चलता. हरपाल सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ.कैसे दिन डूबने को आई,पता ही न चला.

इधर राज परिवार के सदस्य भूख प्यास से तड़पने लगे. क्योंकि उन्होंने हरपाल सिंह के मरने के बाद ही अन्य जल ग्रहण करने की प्रतिज्ञा की थी. राजा का बेटा भूख-प्यास सहन नहीं कर सका.वह जानना चाहता था कि हरपालसिंह का सिर अब तक क्यों नहीं पहुंचा?

वास्तविकता जानने के लिए राजकुमार एक साधारण पुरुष का वेश बनाकर उसी सैनिक के पास जा पहुंचा जिसे राजा ने हरपाल सिंह का सिर काटने की आज्ञा दी थी.

वहां जाकर उसने सैनिक से पूछा-" काम अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ?
वह सैनिक वेश बदले हुए राजकुमार को नहीं पहचान पाया. उसने समझा कि यही वो व्यक्ति है जिसका सिर काटने के लिए मुझे महराज ने यहाँ  भेजा है.

उसने झट राजकुमार का सिर काट दिया.

यदि हरपालसिंह बूढ़े की पांच बातें नहीं मानता तो क्या होता?

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"

||सपनों की दुनिया||

दिखते नभ में उड़ते पक्षी,
दिखती कभी जल में तैरती मीन.
ये स्वप्नों की दुनिया भी,
होती है बड़ी ही रंगीन.

कभी झरते झरनों की झर-झर,
कभी वाटिका में खिले सुमनों की छवि.
चलती कभी नौका सरिता में,
कभी अस्ताचल में,अस्त होता रवि.

दिखती कभी पर्वतमालाएँ,
करती हुई नभ का स्पर्श.
देख वन-उपवन की शोभा ,
होता अपार हृदय में हर्ष.

मन की नदी में जैसे,
विचारों का जल बहता है.
कभी ध्यान से सुनना,
हर सपना भी कुछ कहता है.

सुख-दुख,लाभ-हानि,
दिखते जन्म-मरण,शत्रु-मित्र.
वर्तमान कभी,कभी भविष्य दिखता,
कभी दिखता अतीत का चित्र.

जीवन की रात्रि में,
हम भी हैं जैसे सोए हुए.
वास्तविकता से परे,
निजता में ही खोए हुए.

इससे पहले कि मृत्यु आकर,
हमारा द्वार खटखटाए.
है उचित यही कि हम,
उससे पहले ही जाग जाएँ.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
     कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

सोमवार, 10 जुलाई 2017

||सावन आगे रे||

धरती माँ के सुन्ना कोरा,अब हरियागे रे.
आगे आगे आगे भइय्या,सावन आगे रे.

कोन जनि जा रिहिन ए मन कते देस.
बादर लेके आ गिन हें खुसी के संदेस.
रिमझिम रिमझिम गिरही अब पानी.
बढ़िया होही सबके खेती-किसानी.

जम्मो झन के हिरदय म,खुसी छागे रे.
आगे आगे आगे भइय्या,सावन आगे रे.

चारों कोती हरेली बगर गे.
सुघ्घर माटी के रूप निखर गे.
चल न चढ़ाबो संकर बाबा ल फूल-बेलपान.
मिलके रहन जम्मोझन,मिलय अइसन गियान.

दिया जलय मया के जगमग,अँधियारी दुरिहा भागे रे.
आगे आगे आगे भइय्या,सावन आगे रे.

अही हरियर हरेली अउ,भाई-बहिनी के राखी तिहार.
होही धरती दाई के पूजा,मिलही सब झन ल मया दुलार.
जग ले सुंदर इहाँ देख ले,नदिया-नरवा,जंगल-घाटी.
कण-कण म देंवता विराजें,हे धन्य अइसन छत्तीसगढ़ के माटी.

एखर तो कोरा ग भइय्या,जइसे सरग लागे रे.
आगे आगे आगे भइय्या,सावन आगे रे.

धरती माँ के सुन्ना कोरा,अब हरियागे रे.
आगे आगे आगे भइय्या,सावन आगे रे.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
     कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

||तुम्हें क्या कहूँ?||

शहद सरीखे मीठे बैन,
तीर चलाते से नैन,
एक बार देखे छवि जो तुम्हारी,
आए कैसे भला,उसे फिर चैन.

कुंतल नाग,दन्त अति सुन्दर.
शशि या तुम,नहीं कोई अंतर.
सौंदर्य तुम्हारा कौन बखाने,
हुए परास्त,सब कवि धुरंधर.

तन-मन सुन्दर किंतु,तनिक न तुझमें दर्प.
हुई तुमसे,कई अप्सराएँ भी हतदर्प.
मोहनी रूप  देख तुम्हारा,
हुआ स्वयं भी मोहित कंदर्प.

लाजवंती कहूँ,चम्पा कहूँ,या कहूँ तुम्हें फूलों की रानी.
होगा कहीं और किंतु,धरा पर तो नहीं है तुम्हारा सानी.
जिसका हिय हो तुमसे आहत,
वो स्वप्न में भी न माँगे पानी.

शब्दार्थ:-
कुंतल=केश,बाल.
धुरंधर=श्रेष्ठ.
दर्प=अहंकार.
हतदर्प=जिसका अभिमान भंग हो गया हो.
कंदर्प=कामदेव.
सानी=बराबरी का,दूसरा.

✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
   कोण्डागाँव(छत्तीसगढ़)

चाटी_भाजी

 बरसात के पानी से नमी पाकर धरती खिल गई है.कई हरी-भरी वनस्पतियों के साथ ये घास भी खेतों में फैली  हुई लहलहा रही है.चाटी (चींटी) क...