विपत्तियाँ मनुष्य को माँजती हैं,उसे परिष्कृत करती हैं.पर मानव उन्हें अपना दुर्भाग्य समझ बैठता है.कठिनाइयों से लड़कर मनुष्य धैर्यवान और सबल बनता है.असफलता से सीखकर ही वह सफलता की ओर कदम बढ़ाता है.कई बार हम प्रतिकूल परिस्थियों को अपनी पराजय का जिम्मेदार मान लेते हैं. पर यह सत्य नहीं है.अपनी विफलता के लिए मानव स्वयं उत्तरदायी होता है.देव स्थलों पर जाने,मूर्तियों पर चढ़ावा चढ़ाने मात्र से सभी प्रकार के सुख,सारी सफलताएँ नहीं मिल जातीं,बल्कि मनुष्य का आत्मबल और अथक परिश्रम ही उसे जीवन में विजयश्री दिलाता है. श्रीराम चरित मानस के सुन्दर काण्ड की एक चौपाई में तुलसीजी ने अकर्मण्य होकर ईश्वर को पुकारने वालों को धिक्कारते हए कहा है- कादर मन कहुँ एक आधारा.दैव-दैव आलसी पुकारा. यानी कि कायर दुर्बल और आलसी मनुष्य जिसे स्वयं की शक्ति पर विश्वास नहीं होता वही ईश्वर को पुकारता है. इसका अर्थ यह नहीं कि हम ईश्वर की सत्ता को नकार दें.हर धर्म,पंथ या संप्रदाय किसी न किसी रूप में ईश्वर की उपस्थिति को अवश्य स्वीकारता है.निस्सन्देह कोई तो ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को अच्छे विचार और कर्म करने को और बुराइयों दूर रहने को प्रेरित करती है,(भले ही हम उसकी आवाज अनसुनी कर देते हैं.)वही ईश्वर है. अपने अवगुणों का त्याग करके और सद्गुणों को धारण कर हम उस शक्ति को अपने और भी निकट पाते हैं. इसलिए हमें चाहिए कि हम विपत्तियों या असफलताओं से डरे नहीं बल्कि दुगुने परिश्रम व दृढ़ विश्वास के साथ प्रयत्न में जुट जाएँ. ✍अशोक नेताम"बस्तरिया"
बुधवार, 27 जून 2018
||चिन्तन||
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