बुधवार, 27 जून 2018

||इन्सानियत||

अमलतास का वृक्ष सुनहरे फूलों से लदा हुआ था।उनकी शाखाओं में एक भी पत्ती नहीं थी,पर वह मुस्कुरा रहा था।पास खड़े  दूसरे वृक्ष ने अमलतास से पूछा-"इस भीषण गर्मी में जबकि तुम्हारे पास हरे-हरे पत्ते भी नहीं है जिनकी सहायता से पेड़ अपना भोजन बनाते हैं,तुम इतने प्रसन्न हो।कैसे?"
अमलतास ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-"मैंने अपने पत्तों का त्याग कर दिया और सुंदर पीले फूल धारण कर लिया।क्योंकि कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है।जब मुझे खिला देखकर लोग मुस्कुराते हैं।तो उन्हें देखकर मैं भी अपने गम भूल जाता हूँ,और हमेशा मुस्कुराता हूँ.औरों की खुशी में खुश होना और किसी के दुख से दुखी होना यही इंसानियत है।"

(संलग्न फोटो इंटरनेट से)

✍ अशोक नेताम "बस्तरिया"

||सत्ते आय कि नइ?||

मनुक आस तुय डंड होतो के नी डर,
गागलोय बीता तो एक दिन हासेसे.

भात-पेज देस खुबे मया कर हुनके मांतर,
बयहा होलो ने कुकुर घरबीताय के चाबेसे.

मीटे-मीट मंजा नी दय ना भाई जीवना ने.
रोजे चाकलेट खादलोने ने दात कुहुन जाएसे.

जमाय काम करा ना तुमि सहीं समया ने,
बत्तर मोहका ने बुनलो धान झटके जागेसे.

आपलो मन भीतर होउक नी दिहा काना,
बेड़ा चो पार फुटलोने ने पानी कहाँ थेबेसे.

करम करा रोजे ओगाय बसुन नी रहा,
रोजे काम ने एतो कडरी छक-छक लागेसे.

सब लगलासत खेलतो ने आपलो मोबइल के,
अरु बलसत आमके आजकल कहाँ फाबेसे.

अशोक नेताम "बस्तरिया"

||याद आता है बचपन||

(पुरी की यादें)

मिडिल स्कूल और हाई स्कूल की दूरी लगभग 100 मी. की रही होगी.हम कक्षा 6 में पढ़ते थे और पिताजी की ड्यूटी हाई स्कूल में थी.कभी-कभी पिताजी साइकिल से ड्रम में स्कूल के लिए पानी ले जाते हुए दिख जाते थे.

उस समय बाँटी यानी कि कंचे का खेल बच्चों के सिर चढ़कर बोलता था.हमारी सारी जेबें कंचों से भरी होती थीं.पैसे जीतने के खेल भी मजे से खेले जाते थे.ये दो तरह के खेल थे जिनमें से एक गोच्चा और दूसरा गब्भा कहलाता था.वैसे यह खेल यह एक तरह से जुआ ही था,पर था बड़ा मज़ेदार.
मिडिल स्कूल के ठीक सामने कुछ पथरीला और झाड़ीनुमा क्षेत्र था, जहाँ रोज 5-6 जगहों पर पैसों का ये खेल चलता था.इन खेलों में सिक्के दाँव पर लगाए जाते थे.मैं भी रोज उस खेल में शामिल होता था.कभी जीत हाथ लगती थी,और कभी हार.पर खेल में मुझे बहुत मजा आता था.
एक दिन स्कूल के शिक्षकों ने आठवीं पढ़ रहे बड़े लड़कों के साथ हमारे अड्डों पर छापा मारा.सभी इधर- उधर बेतहाशा भागे.पर सारे खिलाड़ी पकड़ में आ ही गए.
पूछताछ के लिए खड़े किए गए लगभग 30-35 बच्चों में एक मैं भी था.जब शिक्षक मुझे दण्डित  कर रहे थे,उसी समय पिताजी साइकिल के कैरियर में पानी का ड्रम दबाकर हैंडपम्प से स्कूल वापस जा रहे थे.उन्हें देखकर मुझे बड़ी ग्लानि हुई.लगा कि माता-पिता अपने बेटों के सुखद भविष्य के लिए क्या क्या नहीं करते,और एक मैं हूँ जो ऐसे काम कर रहा हूँ,जिनसे उन्हें शर्मिंदा होना पड़ रहा है.फिर मैंने वो खेल हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दिया.

अपने पिता पर मुझे गर्व है.आज यदि दो-चार लोग मुझे मेरे नाम से जानते हैं तो उसके पीछे पिताजी के संघर्ष और परिश्रम ही मूल कारण हैं.

प्रत्येक मानव को ऐसे कर्म करने चाहिए कि जिनसे उनके माता-पिता और मातृभूमि को सम्मान मिले,जिनसे अपनों की छाती चौड़ी हो जाय और और सभी का सिर गर्व से ऊँचा उठ जाय.

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||गाँव का जीवन||

अभी गाँव में रहते हुए शुद्ध देशी-ग्रामीण जीवन जीते हुए अत्यंत आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ.अपनी माटी और अपने लोगों के साथ रहने का सुख संभवत: संसार का सबसे बड़ा सुख है.गाँव में करंज का दातौन करने और प्रकृति प्रदत्त दोने पत्तलों में खाने का अपना मजा है.आजकल माँ के हाथों से बने मंडिया पेज,कोइलार भाजी,चेंच भाजी,बेसन अम्मट,रखिया बरी,चार की चिरौंजी जैसे स्थानीय चीजों का भरपूर मजा ले रहा हूँ.बारिश के बाद जंगल में "बोड़ा" के आने का संदेश भी मिला है.
प्रात: जागरण के साथ ही पंछियों के मधुर कलरव से मन प्रसन्न हो जाता है.और गौरेया के तो क्या कहने,ये दिन भर हमारे घर के आँगन में चहकते-फुदकते रहते हैं.साल वनों के सान्निध्य में रहने को मैं अपना परम सौभाग्य समझता हूँ.इन वनों का सौंदर्य अप्रतिम है.
हम लोग कितने खुशनसीब हैं कि जीते जी हमें पेड़ों की छाया तो मिलती ही है बल्कि मौत के बाद भी उनके छाँव की मिट्टी नसीब होती है.

अशोक नेताम "बस्तरिया"

||पतंग||

तंग उड़ रहा था हवा में.
उस मांझे के सहारे,
जिस पर नियंत्रण था एक व्यक्ति का.
हुआ गर्व पतंग को,
अपनी उड़ान-अपनी ऊँचाई पर.
लगा उसे,जैसे वह नाचता हो,
किसी के इशारे पर.
अब वह उड़ना चाहता था,
आकाश में बिलकुल स्वच्छंद.
यही सोचकर अलग कर लिया
उसने खुद को माँझे से.
धीरे-धीरे हवा उड़ा ले गई उसे बहुत दूर .
अंतत: एक सूखे पेड़ की डाल पर फँसकर,
वो पतंग अपना अस्तित्व खो बैठा.

(पतंग आदमी है.जिसके हाथ में माँझा है वह समाज है.
ऊँचाई और उड़ान प्रसिद्धि और सफलता है.मांझा प्रेम या अपनापन है.स्वयं और अपनों के बीच प्रेम की डोर यदि टूट गई तो आदमी अपना वज़ूद खो देता है.)

✍अशोक नेताम "बस्तरिया"

||सोच||

(मेरे इस पोस्ट का उद्देश्य किसी भी समुदाय विशेष को आहत करना नहीं है,लेकिन कई लोगों की मानसिकता ही ऐसी है.)

वह बहुत दिनों बाद ड्यूटी पर आया.

"चैतू तुम स्कूल क्यों नहीं आ रहे थे?पता चला कि तुम आजकल बस शराब के नशे में ही चूर रहते हो."

"हाँ सर!शराब हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है.हमारे रस्मों पर्व-त्यौहारों में ये अनिवार्य है.हम इसके बगैर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, इसलिए हमें 5 लीटर शराब रखने की छूट मिली हुई है.सरकार भी इस पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकती"

"पर नशा व्यक्ति के तन-मन और धन का नाश ही करता है.आवेश में आकर वह कुछ भी कर बैठता है.किसी से अकारण वाद-विवाद और मारपीट कर लेता है."

"हाँ सर.लेकिन ये हमारे अधिकार की रक्षा भी तो करता है.

"कौन सा और कैसा अधिकार?"

"आरक्षण का अधिकार.आपको तो पता ही है कि हमें आरक्षण क्यों मिला है?"

"हाँ!ताकि सदियों से उच्च वर्ग द्वारा शोषित और पिछड़े वर्ग के लोग इसकी सहायता से स्वयं को दूसरों के समकक्ष खड़ा कर सकें.हमारे देश में आर्थिक-सामाजिक समानता आए.ऊँच-नीच की खाई सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाए."

"हम यही तो नहीं चाहते.क्योंकि संभव है कल हमारे सम्पन्न और शिक्षित हो जाने पर हमसे हमारा यह महत्वपूर्ण अधिकार छिन जाए.इसलिए हम शराब पीते हैं.हमें स्वयं के स्तर में कोई सुधार नहीं लाना है.हम जैसे हैं,वैसे ही रहेंगे.और शराब तो कभी नहीं छोड़ेंगे."

प्रधानाध्यापक निरुत्तर थे.

✍ अशोक नेताम "बस्तरिया"

||चिन्तन||


विपत्तियाँ मनुष्य को माँजती हैं,उसे परिष्कृत करती हैं.पर मानव उन्हें अपना दुर्भाग्य समझ बैठता है.कठिनाइयों से लड़कर मनुष्य धैर्यवान और सबल बनता है.असफलता से सीखकर ही वह सफलता की ओर कदम बढ़ाता है.कई बार हम प्रतिकूल परिस्थियों को अपनी पराजय का जिम्मेदार मान लेते हैं.  पर यह सत्य नहीं है.अपनी विफलता के लिए मानव स्वयं  उत्तरदायी होता है.देव स्थलों पर जाने,मूर्तियों पर चढ़ावा चढ़ाने मात्र से सभी प्रकार के सुख,सारी सफलताएँ नहीं मिल जातीं,बल्कि मनुष्य का आत्मबल और अथक परिश्रम ही उसे जीवन में विजयश्री दिलाता है.  श्रीराम चरित मानस के सुन्दर काण्ड की एक चौपाई में तुलसीजी ने अकर्मण्य होकर ईश्वर को पुकारने वालों को धिक्कारते हए कहा है- कादर मन कहुँ एक आधारा.दैव-दैव आलसी पुकारा.  यानी कि कायर दुर्बल और आलसी मनुष्य जिसे स्वयं की शक्ति पर विश्वास नहीं होता वही ईश्वर को पुकारता है.  इसका अर्थ यह नहीं कि हम ईश्वर की सत्ता को नकार दें.हर धर्म,पंथ या संप्रदाय किसी न किसी रूप में ईश्वर की उपस्थिति को अवश्य स्वीकारता है.निस्सन्देह कोई तो ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को अच्छे विचार और कर्म करने को और बुराइयों दूर रहने को प्रेरित करती है,(भले ही हम उसकी आवाज अनसुनी कर देते हैं.)वही ईश्वर है. अपने अवगुणों का त्याग करके और सद्गुणों को धारण कर हम उस शक्ति को अपने और भी निकट पाते हैं.   इसलिए हमें चाहिए कि हम विपत्तियों या असफलताओं से डरे नहीं बल्कि दुगुने परिश्रम व दृढ़ विश्वास के साथ प्रयत्न में जुट जाएँ.  ✍अशोक नेताम"बस्तरिया"

चाटी_भाजी

 बरसात के पानी से नमी पाकर धरती खिल गई है.कई हरी-भरी वनस्पतियों के साथ ये घास भी खेतों में फैली  हुई लहलहा रही है.चाटी (चींटी) क...